रामायण बनाम वामपंथ
रामायण पर वामपंथ प्रेरित इतिहासकारों के मत का खंडन
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मित्रों,
सादर प्रणाम!
भारत में ईसाइयत के पदार्पण के साथ ही भारतीय ज्ञान,परंपरा, विज्ञान, धर्म, अध्यात्म, ब्राह्मण , मान्यताएं, समाज, संस्कृति और इतिहास आदि पर निरंतर प्रहार जारी है, ताकि पाश्चात्य संस्कृति ज्ञान परंपरा आदि की श्रेष्ठता सिद्ध कर लोगों का धर्मांतरण करवाया जाए, बाद में लोभवश वामपंथी मुस्लिम और राजनैतिक दल भी जुड़ते चले गए , आज स्थिति यह है कि नई पीढ़ी तो नई पीढ़ी बुजुर्गों का लेख देख उनकी अज्ञानता भारतीय संस्कृति के मर्म स्पर्शी नाश पर सहसा ही नेत्रों में अश्रु भर जाता है।
आइए उन महाशय के लेख के आपत्तिजनक बिंदुओं पर शास्त्र सिद्ध मत रखते हैं:
१. तुलसी दास जी का रामचरितमानस महर्षि वाल्मिकी का कॉपी नही अपितु उस पर आधारित है
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ये आंशिक सत्य है तुलसीदास जी ने स्वयं लिखा है:
छहों शास्त्र सब ग्रंथन को रस
अर्थात मानस जी में तुलसी दास जी ने छहों शास्त्र (सांख्य, योग,न्याय,वैशेषिक,वेदांत और मीमांसा) और सभी ग्रंथों के रस का निचोड़ रख दिया, इस में वाल्मिकी रामायण से भी कुछ लिया गया है , किंतु मुख्य रूप से रामचरित मानस का आधार महर्षि वेद व्यास कृत आध्यात्म रामायण है।
२. वाल्मिकी रामायण का आधार पाणिनी हैं जो कि नंद के दरबार में थे
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वाल्मिकी रामायण का आधार महर्षि नारद द्वारा श्रौत परंपरा से वाल्मिकी जी को किया गया उपदेश तथा स्कंद पुराण के अनुसार सप्त ऋषियों का आशीर्वाद है:
स्वच्छंदा भारती देवी जीह्वाग्रे ते भविष्यति ।
कृत्वा रामायण काव्य ततो मोक्ष गमिष्यसि ।।
महर्षि वाल्मिकी जी अपौरुषेय वेदों,उपनिषदों, नारद जी के उपदेश तथा समाधिजनित रितम्भरा प्रज्ञा से २४००० श्लोकों में रामायण की रचना की।
किंतु रामायण के संबंध में सुविख्यात है:
रामायण शत कोटि अपारा..
जैसे श्याम देश की राम कथा रामकीर्ति बहुत समय से अस्तित्व में है किंतु उसका लिखित स्वरूप नही था , वनवासी रामायण आदि बहुत समय तक मौखिक ही था।
३. रामायण की रचना नंद वंश और शुंग वंश के शासन काल के बीच हुई है बहुत से विद्वानों का मान ना है कि १८५ ई पू संस्कृत के किसी बड़े पंडित ने रामायण की रचना कर के त्रेता के वाल्मिकी महर्षि के नाम से चेप दिया है।
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आदि कवि वाल्मिकी की रचना यदि रामायण नही है ये मात्र १८५ ई पू की रचना है तो द्वापर कालीन महाभारत में रामायण और वाल्मिकी कृत रामायण का साक्ष्य कैसे प्राप्त होता है?
द्रोणपर्व अंतर्गत जयद्रथ पर्व में वाल्मिकी जी का श्लोक भी उद्धृत है :
अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भूवीee
पीड़ाकरममित्रानां यत स्यात कर्ताव्यमेव तत।।
महोदय आपके अनुसार वाल्मिकी केवल त्रेता में थे तो द्वापर के उद्योग पर्व के भगवद्यान पर्व में
वशिष्ठो वामदेवश्च भूरीद्युम्नो गयः क्रथः
शुक्र नारद वाल्मिका मरुतः कुशिको भृगु:
जिन ऋषियों ने कौरवों के सदन में जाने से पूर्व श्रीकृष्ण की पूजा की उसमे वाल्मिकी भी थे।
ठीक इसी तरह नीति शास्त्र कारों में शुक्राचार्य का महनीय स्थान है शुक्र नीति में वाल्मिकी रामायण का उद्धरण कैसे प्राप्त है? देखें
नहि तद भविता राष्ट्र यत्र रामो ना भूपति:।
तद वन भविता राष्ट्र यत्र रामो निवत्स्यति।।
आगे भी लिखते हैं
मंगलम कोशलेंद्राय महनीय गुणात्मने
चक्रवर्ती तनूजाय सार्व भौमाय मंगलम।।
इसी प्रकार यदि हिन्दू धर्म शास्त्रों को थोड़े देर के लिए यदि गौण भी कर दें तो ५ वी ई पू के महावीर से पूर्व आजीवक संप्रदाय का अस्तित्व माना गया है, जिसके दर्शन सिद्धांत आदि की जानकारी का आधार वर्तमान में बौद्ध और जैन साहित्य ही है , जैन और बौद्ध भी आजीवकों से ही राम तत्व को स्वीकारते दृष्टिगोचर होते हैं,
उधर बौद्ध ग्रंथ अनर्धराघव में कोशल्यायन को स्वीकार्य है
यांति न्याय प्रवृतस्य तिर्यांचोपि सहायतम्
आपंथानं तु गच्छंत सोदरोपि विमुंचति ।।
एक तरफ नास्तिक मत बौद्ध दूसरे तरफ नल नील द्वारा मात्र पांच दिन में सौ योजन पुल निर्माण की चमत्कार पूर्ण बात की स्वीकारोक्ति कैसे संभव है तथा
कथित वर्तमान ज्ञानी जन?
ये थी वाल्मिकी रामायण की स्वीकार्यता क्योंकि सत्य को छुपाया नही जा सकता है।
ज्ञान मार्ग या नास्तिक मार्ग से भी चलें तो राम कौन हैं ? सूर्य वंशी
शरीर के ५ चक्रों का भेदन कर के राम लंका पहुंचते हैं, दिन का विचार भारत में जैन बौद्ध सभी मतों में प्रायः सूर्योदय से ही होता है,, राम सूर्य वंशी सूर्य।
आपने अपने लेख में और भी अनेक बकवास किए हैं किंतु ये लेख बड़ा हो रहा है इसलिए आपके शेष पाखंड का खंडन अगले भाग में विस्तार से लिखूंगा।
धन्यवाद
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