मुद्रा
~ आध्यात्मिक विकास मे मुद्रा का महत्त्व ~ (अम्बुज शर्मा) °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° नमो नारायण, चार पुरुषार्थ को साधने के लिए ही मानव जीवन है, श्री कृष्ण कहते हैँ : योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥" श्रीगीताजी 2/48 आप किसी भी पुरुषार्थ का साधन कर रहे हो कोई भी क्रिया मे तल्लीन हो सदा समान भाव से आसक्ति त्याग कर योग की स्थिति मे रहना ही सनातन का मूल सिद्धांत है, चारो पुरुषार्थ (धर्म अर्थ काम मोक्ष )के सिद्धि हेतू ही पंचांग षडांग आष्टांग योग सूत्र प्रतिपादित हैँ, इन चारो मे चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष का साधन ज्ञान है एवं ज्ञान का साधन योग है. गुरु गोरक्ष नाथ कहते हैँ :- ||योगो अपि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि|| कोई साधक ज्ञाननिष्ठ विरक्त धर्मज्ञ जितेन्द्रिय या स्वयं देवता ही क्यूँ ना हो बिना योग के मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता है. ज्ञाननिष...