Posts

मुद्रा

~ आध्यात्मिक विकास मे मुद्रा का महत्त्व ~          (अम्बुज शर्मा) °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° नमो नारायण,                 चार पुरुषार्थ को साधने के लिए ही मानव जीवन है, श्री कृष्ण कहते हैँ : योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥"          श्रीगीताजी 2/48 आप किसी भी पुरुषार्थ का साधन कर रहे हो कोई भी क्रिया मे तल्लीन हो सदा समान भाव से आसक्ति त्याग कर योग की स्थिति मे रहना ही सनातन का मूल सिद्धांत है, चारो पुरुषार्थ (धर्म अर्थ काम मोक्ष )के सिद्धि हेतू ही पंचांग षडांग आष्टांग योग सूत्र प्रतिपादित हैँ, इन चारो मे चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष का साधन ज्ञान है एवं ज्ञान का साधन योग है. गुरु गोरक्ष नाथ कहते हैँ :-  ||योगो अपि ज्ञानहीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि|| कोई साधक ज्ञाननिष्ठ विरक्त धर्मज्ञ जितेन्द्रिय या स्वयं देवता ही क्यूँ ना हो बिना योग के मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता है. ज्ञाननिष...

सामंती (जमींदारी): व्यवस्था या प्रथा

Image
जमींदारी: प्रशासनिक व्यवस्था या प्रथा?? ==================================== वैश्विक पटल पर ज्ञात सभ्यताई मानव इतिहास मे अनेकानेक सामाजिक प्रशासनिक व्यवस्था अस्तित्व मे रही, कुछ सीमित क्षेत्रों मे तथा सीमित समय सीमा तक अस्तित्व मे रही तथा कुछ व्यापक और लम्बे समय तक किन्तु इन सब मे वर्तमान भारत मे सर्वाधिक चर्चा जमींदारी की होती है, सब से हास्यास्पद बात तो यह है कि इस व्यवस्था पर लिखने बोलने वाले आज तक उक्त विषय के साथ सम्यक न्याय नहीं कर पाए. इसका कारण यह है कि उक्त विषय पर उनकी मौलिक समझ ही त्रुटि पूर्ण रही है. प्रथा शब्द (प्रथ + अङ + टाप)( ङ और प मे हलन्त है जिसे मोबाइल से नहीं लिख पा रहा ) इस शब्द का अर्थ है ख्याति,  रीति-रिवाज़, प्रसिद्धि या परंपरा से है. भारतीय संस्कृति तथा इतिहास का कोई जानकार यह नहीं कह सकता कि जमींदारी कोई रीति रिवाज़ या परंपरा रही है, यदि ये परंपरा होती तो विवाह मे तिलक के भांति कानून उन्मूलन के बावजूद आज भी प्रत्यक्षत: अस्तित्व मे होती. इसी का समानार्थी सामंती व्यवस्था को प्रथा कहना भी सर्वथा अनुचित है. जिस प्रकार आज देश मे लोकतांत्रिक व्यवस्था ...

राजनैतिक स्वार्थ और जाति जनगणना

Image
मित्रों     समकालीन राजनेता जनतंत्र में भी जननेता होने बजाय जनता को स्वहित हेतु बरगला कर उसी जनता के मत अधिकार का अधिग्रहण कर उसी जनता पर राज करने की मंशा रखते हैं। यही लोकशाही के विफलता का कारण है, किन्तु ये कोई नया प्रसङ्ग नही , सत्ता तथा शासक सदा निष्कण्टक शासन की चाह रखती है। उन निरंकुशों पर अंकुश का दायित्व सदा विद्या बुद्धि वारिधि समाज के विद्वानों का रहा है। इसी क्रम में वृहद् ब्राह्मण समाज के सबसे सशक्त अंग भूमिहार ब्राह्मणों को केवल भूमिहार के रुप में उद्भासित करने का अदूरदर्शी तथा घृणित षड्यंत्र कुछ सतालोलुप तत्वों ने रचा है , इस से संभव है कि राजनीति में २-४ सीटों का समाज को क्षेत्रिय  स्तर पर लाभ हो जाए, कुछ नेता जीत जाएँ कितु उसकी कीमत क्या समाज को आधार विहीन कर देना तर्क सङ्गत है ? राष्ट्रिय राजनीति में केवल भूमिहार कहाँ होंगे, ब्राह्मण आपको छोडकर भी अपना प्रधानमंत्री दे सकता है, इतनी संख्या है उनकी देश में, पर क्या आप क्षेत्र विशेष तक सीमित संकुचित रखना चाहते हैं समाज को ? राष्ट्र को जातियो में दृढ़ता से जकड के योग्य-अयोग्य का विचार किए बिना संसा...

बिहार मे भूमि सर्वे और बेतियाराज की वसीयत

Image
बेतिया राज के असली वारिस स्वर्गीय भगवती शरण सिंह थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सन् 2012 ईस्वी में उनको बेतिया राज का असली वारिस मानकर संपत्ति का असली हकदार बताकर उनके पक्ष में फैसला सुनाया था लेकिन बिहार सरकार ने संपत्ति सौंपने से इंकार कर दिया था। बेतिया राज के नामधारी राजा स्वर्गीय भगवती शरण सिंह के तीनों बेटों ने इस मामले के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल किया था। मामला अभी लंबित है। बेतिया राज की अंतिम महारानी जानकी कुंअर ने इलाहाबाद में अपने रिश्तेदार के घर रहते हुए अपने रिश्तेदार भगवती शरण सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। बेतिया राज में अंग्रेज और उनके चापलूसों की प्रतारणा से तंग होकर महारानी जानकी कुंअर अपने रिस्तेदार भगवती शरण सिंह के घर इलाहाबाद चली गई थी वहीं रहते हुए महारानी जानकी कुंअर की मृत्यु हुई थी। भगवती शरण सिंह के परिवार ने आदर - सम्मान एवं पूरी निष्ठा से महारानी की सेवा किया था। महारानी द्वारा लिखित वसीयतनामा के कागजात भगवती शरण सिंह के पास सुरक्षित हैं, जिसके आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। बेतिया राज की संपत्ति के मामले में शुरू ...

कौशिक ब्राह्मण और भूमिहार ब्राह्मण

Image
प्रणाम!    क्षमा सहित बहुत जिम्मेदारी और आदर से लिख रहा हूँ रेवतीपुर शेरपुर आदि या मलाईया पांडे  आदि लोग मूर्खता कर रहे हैँ, तभी विवाद किये रहते हैँ आपस मे, साथ ही रेवतीपुर के वशिष्ठ गोत्री भी. जहाँ देखो सब फ़तेहपुर सीकरी से ये सब स्वयं को जोड़ते मिलेंगे बिना किसी शास्त्रीय आधार के. सिकरवार क्षत्रिय राजवंश की कुलदेवी आशावरी माताजी हैं. इनका मंदिर राजस्थान के अलवर ज़िले की राजगढ़ तहसील में राजौरगढ़ में है. यह मंदिर बड़गूजर वंश के राजा अचलदेव जी ने 813 ईस्वी में बनवाया था. सकरवार और सिकरवार बिल्कुल भिन्न हैँ सकरवार क्षत्रिय विश्वामित्र पुत्र सांकृत के वंशज है जो कंस वध के बाद कृष्ण के विरुद्ध  जरासंध के साथ थे युद्ध मे. (प्रमाण संलग्न है महाभारत से) ये ब्रह्म क्षत्रिय कहे जाते हैँ. वही सकरवार भूमिहार ब्राह्मण और मलाईया पांडे महर्षि सांकृत के वंशज हैँ जो ऋषि अहिरबुद्धन्य के शिष्य थे और चक्षुषमती विद्या संसार को दे कर गए, भगवान दत्त से अवधूत उपनिषद का ज्ञान भी यही सर्व प्रथम प्राप्त कर संसार मे प्रसारित किये. सकरवार ब्रह्मक्ष...

छल

Image
भारद्वाज गोत्रिय द्रुमटिकार/डोमकटार ब्राह्मणों के शव पर बसा है गोरखपुरिया सत्तासी राज ############################ भट्ट ग्राम टिकारी के भारद्वाज भूमिहार ब्राह्मणों का उल्लेख राष्ट्रकूट,यादव,सोम,भुज,पाल,चंदेल एवं परमार दानपत्रों में प्राप्त है जो इन भारद्वाज गोत्र द्रोणटिकार मूल के भूमिहार ब्राह्मणों की कम से कम ७वी_८वी सदी से उस क्षेत्र में उपस्थिति तो प्रत्यक्षतः पुष्ट करती ही है। खोट्टिग दानपत्र से यह भी सिद्ध है कि यहीं (टिकारी) से भारद्वाज गोत्रि द्रुमटिकार कुल के ब्राह्मण कर्णाटक गये हैं। कोलगल्लू दान पत्र तो टिकारी द्रोणटिकारों के कुल के सुप्रसिद्ध कवि मधुसूदन का भी नामोल्लेख करता है। धातव्य है कि द्रोणाचार्य भी भारद्वाज ही थे। कर्णाटक के यादव भिल्लम तृतीय के कलस बुद्रुख दान पत्र से भी टिकारी से भारद्वाजी ब्राह्मणों का कर्णाटक गमन सिद्ध है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी टक्कार/टिकार और टेक्कार जैसे प्राचीन गढ़ भारद्वाज गोत्रिय ब्राह्मणों के अस्तित्व में रहे हैं जो भारद्वाज मूल टिकार का की याद संजोने हेतु इनके पूर्वजों का प्रयास रहा है ... गोरख पूरी या सत्तासी राज की स्थापना ...

तुलसी वाणी (पुजिए विप्र शील गुण हीना)

Image
पूजिए विप्र सील गुणहीना.. ************************** मित्रों,  जिस महाकाव्य के थाह पाने को सैकडो मुनि कवि आज तक गोता लगा रहे, जिस महाग्रंथ पर साक्षात् विश्वनाथ शिव का हस्ताक्षर है :                सत्यं शिवम् सुन्दरम् जिस रामचरितमानसजी को साक्षात् शिवजी ने प्रमाणित किया कि सत्य है सत्य है सत्य है, सुन्दर है सुन्दर है सुन्दर है, उसमे दोष दृष्टि रखने वाले को निश्चित समाज बाह्य कर दिया जाना चाहिए। उन दोष दृष्टि रखने वालो से पूर्व नकली डिग्रीधारी प्रोफेसर बने हुए ब्राह्मण जवाब नही दे पाते तो दु:ख होता है, अरे भई नही समझ आता तो श्रेष्ठ आचार्यों के शरण में जा के सीखो.. वहाँ भी न सकते तो मेरे जैसे विद्या-व्यसनी गृहस्थ के ही पास आ जाओ भई मेकाले शिक्षित कुपढ़ प्रोफेसरो को न्यूज चैनल पर बिठाकर तुलसीदास और रामायण पर डिबेट चलाया जा रहा.. प्रसङ्ग है पूजिअ विप्र सीलगुन हीना। सूद्र न गुनगन ज्ञान प्रबीना।। यह प्रकरण अरण्यकांड में, कबंध नाम राक्षस के प्रति भगवान् श्रीराम की उक्ति है: (गीताप्रेस के संस्करण मे इसका अर्थ इस प्रकार है :) शील और गुण से हीन ब्राह्मण...