राजनैतिक स्वार्थ और जाति जनगणना

मित्रों
    समकालीन राजनेता जनतंत्र में भी जननेता होने बजाय जनता को स्वहित हेतु बरगला कर उसी जनता के मत अधिकार का अधिग्रहण कर उसी जनता पर राज करने की मंशा रखते हैं। यही लोकशाही के विफलता का कारण है, किन्तु ये कोई नया प्रसङ्ग नही , सत्ता तथा शासक सदा निष्कण्टक शासन की चाह रखती है। उन निरंकुशों पर अंकुश का दायित्व सदा विद्या बुद्धि वारिधि समाज के विद्वानों का रहा है। इसी क्रम में वृहद् ब्राह्मण समाज के सबसे सशक्त अंग भूमिहार ब्राह्मणों को केवल भूमिहार के रुप में उद्भासित करने का अदूरदर्शी तथा घृणित षड्यंत्र कुछ सतालोलुप तत्वों ने रचा है , इस से संभव है कि राजनीति में २-४ सीटों का समाज को क्षेत्रिय  स्तर पर लाभ हो जाए, कुछ नेता जीत जाएँ कितु उसकी कीमत क्या समाज को आधार विहीन कर देना तर्क सङ्गत है ?
राष्ट्रिय राजनीति में केवल भूमिहार कहाँ होंगे, ब्राह्मण आपको छोडकर भी अपना प्रधानमंत्री दे सकता है, इतनी संख्या है उनकी देश में, पर क्या आप क्षेत्र विशेष तक सीमित संकुचित रखना चाहते हैं समाज को ?

राष्ट्र को जातियो में दृढ़ता से जकड के योग्य-अयोग्य का विचार किए बिना संसाधनों के बंदर बाँट का कुत्सित प्रयत्न राज्य तथा देश को कहाँ ले जाएगा ?

क्या २-४ सीटो के लालच में सम्पूर्ण समाज को पुनः जातिय विद्वेष के राह पर धकेलना तर्क सङ्गत है ? 

खैर! अब संपूर्ण भूमिहार ब्राह्मण समाज पर पडने वाले प्रभाव का सम्यक् आकलन करते हैं :

शुकरी विष्ठा के चकर मे ब्राह्मण मर्यादा त्यागने पर युवाओं की दशा क्या होगी, आगामी पीढियों का क्या होगा?
एक उदाहरण से समझें :
एक त्यौहार है मकर संक्रान्ति _ पौराणिक हिन्दू पञ्चाङ्ग में सौर गणना के अनुसार जब सूर्य मकर राशि में गोचर करते हैं तब यह त्योहार मनाया जाता है , आज से कुछ वर्ष पूर्व अंग्रेजी कैलेण्डर से विचार करने पर यह त्योहार प्रायः १४ जनवरी को आता था, उस से पूर्व १३ को , बहुत पहले यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होता था, वर्तमान् में १५ जनवरी को सूर्य मकर मे गोचर करेंगे - मकर संक्रांति के भांति पंजाब में सिखों का त्योहार है लोहडी = मूल से कटने के कारण सिख सरदार इस त्योहार का महत्व गणना आदि भूल गये और कटुता के चक्कर मे हिन्दु सौर गणना मानते नही वर्ना उनके भिन्न धर्म होने के सिद्धान्त का लोप हो जाएगा - इतिहास सिद्ध सत्य है कि सिख धर्म के सभी गुरु वास्तव में रामानंद परंपरा के अंतर्गत हुए हैं- खालसा आज भी साधुओं का जमात होता है (कुंभ मेले में देख सकते हैं ) _ दशमेश गुरु के अवसान के पश्चात् सिख सरदारों ने विजित भूमि पर स्वामित्व के मद मे स्वयं को धीरे-धीरे अन्य हिन्दु गुरुजनों तथा उनके शिष्यों से श्रेष्ठ समझने लगे तथा आत्म श्लाघा में सिख पंथ को सिख धर्म घोषित किया, नतीजन आज सर्वाधिक विवाहेत्तर संबंध, अंतःजातिय - अंतःधार्मिक प्रेम विवाह, क्रिस्चियनिटी में कन्वर्जन सिखों का है _ साथ ही धरती का अमर्यादित दोहन इन्हे सर्वाधिक कैंसर जैसे भयानक बीमारी से पीडित कम्यूनिटी बनाता है।

संतोष ही सुख है संतोष नही तो विवाहेत्तर ५० संबंध भी तृप्त नहीं कर सकते, ये इन्हे कौन समझाये ? बाहर विदेश बसने के लालच मे सिख ललनाओं के पिता सहमती से पुत्रियों का कांट्रेक्ट मैरेज तक धडल्ले से करते हैं, 
तो क्या भूमिहार नेता गृहस्थ धर्म हीन विखंडित परिवार वाल ऐसा समाज देना चाहते हैं वर्तमान् भूमिहार नेता ?

ब्राह्मण समाज से कटने पर समय के साथ पीढियाँ अपने ब्रह्मणत्व कुल गोत्र को विस्मृत कर केवल मिलते-जुलते नाम के आधार पर भूमिया भूइंया आदि शुद्र जातियों से विवाह करने में नही हिचकेंगी _ प्रमाण स्वरुप दिल्ली पंजाब के जैन बने हिन्दु बनियों को देखें। क्या वर्णसंकर हमारा तथा हमारे पुरखों का उद्धार करेंगे? फिर गया तीर्थ का क्या होगा जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने लहु से सींच कर जीवित रखा है ?

हमारे मठ मंदिरों पर अधिकार का क्या होगा ? दंड ग्रहण तथा संन्यास के अधिकार का क्या होगा ?

मठ मंदिर गुरुकुल दंड संन्यास आपको अन्य समाज से जोडता है या नेता ?
विद्या के प्रतिष्ठानों पर अधिकार खो देने पर आप की सामाजिक प्रतिष्ठा का क्या होगा ?
नेता केवल चाटुकार पैदा कर सकता है किंतु मठ मादिरों में बैठे गुरु सद् शिष्य।
गुरु ही ब्रह्मा विष्णु महेश हैं _ धर्म के उस उच्चतम् पद पर आरुढ होने का अधिकार त्याग ये २-४ सीटों वाली माया शूकरी विष्टा हमें स्वीकार्य नहीं .
आगे जनतंत्र मे स्वामी जनता है, भूमिहार - ब्राह्मण समाज के लोग समाज के तथाकथित नेताओं से लठ मार कर इन प्रश्नों को पूछे तो भविष्य में कोई ऐसा दु:साहस न करेगा।


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