सामंती (जमींदारी): व्यवस्था या प्रथा

जमींदारी: प्रशासनिक व्यवस्था या प्रथा??
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वैश्विक पटल पर ज्ञात सभ्यताई मानव इतिहास मे अनेकानेक सामाजिक प्रशासनिक व्यवस्था अस्तित्व मे रही, कुछ सीमित क्षेत्रों मे तथा सीमित समय सीमा तक अस्तित्व मे रही तथा कुछ व्यापक और लम्बे समय तक किन्तु इन सब मे वर्तमान भारत मे सर्वाधिक चर्चा जमींदारी की होती है, सब से हास्यास्पद बात तो यह है कि इस व्यवस्था पर लिखने बोलने वाले आज तक उक्त विषय के साथ सम्यक न्याय नहीं कर पाए. इसका कारण यह है कि उक्त विषय पर उनकी मौलिक समझ ही त्रुटि पूर्ण रही है.

प्रथा शब्द (प्रथ + अङ + टाप)( ङ और प मे हलन्त है जिसे मोबाइल से नहीं लिख पा रहा )
इस शब्द का अर्थ है ख्याति,
 रीति-रिवाज़, प्रसिद्धि या परंपरा से है.
भारतीय संस्कृति तथा इतिहास का कोई जानकार यह नहीं कह सकता कि जमींदारी कोई रीति रिवाज़ या परंपरा रही है, यदि ये परंपरा होती तो विवाह मे तिलक के भांति कानून उन्मूलन के बावजूद आज भी प्रत्यक्षत: अस्तित्व मे होती.

इसी का समानार्थी सामंती व्यवस्था को प्रथा कहना भी सर्वथा अनुचित है.

जिस प्रकार आज देश मे लोकतांत्रिक व्यवस्था अस्तित्व मे है उसी प्रकार मानव ने अपने सभ्यताइ समझ के अनुरुप समय-समय पर प्रशासनिक व्यवस्थाएं विकसित की हैँ, कुछ व्यवहार मे रही तो कुछ विचारों मे ही खंडित हो कर दम तोड़ गयी जैसे पश्चिम का अराजकतावाद.

भारत भूमि पर सनातन संस्कृति मे सामंत (जमींदार) शब्द का अर्थ शांति कारक से है, मनुस्मृति का उद्घोष है 
सामदंडौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्र अभिवृद्धये 
अर्थात साम दंड के द्वारा नित्य राष्ट्र की अभिवृद्धि होती है. 

सूर्य की किरणे जिस प्रकार से जीवन पोषण तथा भीषण गर्मी से संहार करती हैँ ठीक वैसे ही सामंत सभ्य समाज के व्यवस्था हेतू नवीन नीतियों युक्तियों को जन्म देकर सभ्य समाज का पोषण तथा सभ्यता के विरोधियों को दण्डित कर राष्ट्र की वृद्धि करते हैं.
व्यवस्था परक शब्दों को परंपरा कह कर सनातन की गौरव शाली परंपरा को अपमानित करने के ईसाई षड़यंत्र के शिकार भारतीय बुद्धिजीवी कब समझेंगे ये तो मुझे ज्ञात नहीं किन्तु मेरी लेखनी सदैव रौशनी बिखेरती रहेगी.

धन्यवाद 
बाबू अम्बुज शर्मा

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