कौशिक ब्राह्मण और भूमिहार ब्राह्मण

प्रणाम!
   क्षमा सहित बहुत जिम्मेदारी और आदर से लिख रहा हूँ रेवतीपुर शेरपुर आदि या मलाईया पांडे  आदि लोग मूर्खता कर रहे हैँ, तभी विवाद किये रहते हैँ आपस मे, साथ ही रेवतीपुर के वशिष्ठ गोत्री भी.
जहाँ देखो सब फ़तेहपुर सीकरी से ये सब स्वयं को जोड़ते मिलेंगे बिना किसी शास्त्रीय आधार के.

सिकरवार क्षत्रिय राजवंश की कुलदेवी आशावरी माताजी हैं. इनका मंदिर राजस्थान के अलवर ज़िले की राजगढ़ तहसील में राजौरगढ़ में है. यह मंदिर बड़गूजर वंश के राजा अचलदेव जी ने 813 ईस्वी में बनवाया था.

सकरवार और सिकरवार बिल्कुल भिन्न हैँ

सकरवार क्षत्रिय विश्वामित्र पुत्र सांकृत के वंशज है जो कंस वध के बाद कृष्ण के विरुद्ध  जरासंध के साथ थे युद्ध मे. (प्रमाण संलग्न है महाभारत से)
ये ब्रह्म क्षत्रिय कहे जाते हैँ.

वही सकरवार भूमिहार ब्राह्मण और मलाईया पांडे महर्षि सांकृत के वंशज हैँ जो ऋषि अहिरबुद्धन्य के शिष्य थे और चक्षुषमती विद्या संसार को दे कर गए, भगवान दत्त से अवधूत उपनिषद का ज्ञान भी यही सर्व प्रथम प्राप्त कर संसार मे प्रसारित किये.

सकरवार ब्रह्मक्षत्रिय को सीनिपति सांकृति लिखा है महाभारत मे प्रमाण संलग्न, ये सीनि कहाँ है?
झारखण्ड के सराय केला मे...

कामाख्या देवि कुल देवि हैँ कामाख्या गहमर (सकरवार क्षत्रिय ) और रेओतीपुर (सकरवार बाभन ) से पूर्व मे है ना कि पश्चिम मे सीकरी मे...

विश्वामित्र सांकृत वंश वर्णन नीचे दे रहा हूं ( प्रमाण संलग्न)

 बुद्ध के पुत्र धर्मात्मा पुरुरवा से उर्वशी अप्सरा ने गन्धर्व पद त्याग कर विवाह किया था, बुद्ध ग्रह का देश मगध है, पूरुरवा प्रयाग के राजा थे, इनकी राजधानी प्रतिष्ठान (झूंसी) थी,उर्वशी के गर्भ से पुरुरवा को निम्नलिखित 7 पुत्र हुए 
आयु 
बुद्धिमान अमावसु 
धर्मात्मा विश्वायु 
श्रुतायु 
दृढ़ायु 
वनायु
शतायु 

अमावसु के पुत्र 
1 भीम
2 नग्नजित 

भीम के पुत्र श्रीमान राजा कांचचनप्रभ, कांचनप्रभ के महाबली परम विद्वान पुत्र सुहोत्र सुहोत्र के 
ऋषि जह्नु (गंगा जी के पिता तभी गंगा जाह्नवी हुई )- इन्होने सर्वमेध नामक बड़ा यज्ञ किया था जिसमे विशालतम अन्न सत्र होता है इन्होने युवनाश्व की पुत्री कावेरी से विवाह किया जिनके गर्भ से 
सुनह नामक धर्मात्मा पुत्र हुए सुनह से अजक, अजक के बालकाश्व, बालकाश्व से क़ुश, क़ुश के 
कुशिक 
कुशनाभ 
कुशाम्भ 
मूर्तीमान 

कुशिक ने इंद्र के समान पुत्र की की इक्षा से तप किया और अपनी पत्नी जो पुरुकुत्स की पुत्री थी के गर्भ से गाधि को उत्पन्न किया, गाधी की पुत्री सत्यवती (यही कौशिकी अर्थात कोशी नदी हैँ )हुई जो भृगु पुत्र ऋचिक से ब्याही गयी, 
ऋचिक के चरु से गाधि को पुत्र हए विश्वरथ विश्वामित्र 

विश्वरथ विश्वामित्र के प्रथम पत्नी से 
1 देवरात या देवश्रवा 
2 कात्यायन गोत्र प्रवर्तक महर्षि कति 
3 बछल 
4 हिरण्याक्ष 

द्वितीय पत्नी रेणु से 
1 रेणुमान 
2 सांकृति 
3 गालव 
4 मुद्गल 
5 मधुछन्द 
6 जय  तथा 
7 देवल 

तृतीय पत्नी माधवी या दृषद्वति से 
1 अष्टक 
2 कच्छप और 
3 हारित 

आगे कौशिक वंश मे हि निम्नलिखित अन्य प्रसिद्ध गोत्रकार महात्मा हुए 
1 पाणिन 
2 बभ्रू
3 ध्यानजप्य
4 पार्थिव 
5 देवरात 
6 शलंकायन 
7 बाष्कल 
8 लोहित 
9 यमदूत 
10 कारीषु 
11 सौश्रुत
12 कौशिक 
13 सैंधवायन 
14 देवल 
15 रेणु 
16 याज्ञवल्क्य
17 अमघर्षण 
18 औदुम्बर 
19 अभिष्णात 
20 तारकायान 
21 चुँचूल 
22 शालावत्या 
23 हिरण्याक्ष 
24 सांकृत्य
25 गालव 
26 बदरायणि 

इन 26 गोत्रकारों के अतिरिक्त भी विश्वामित्र के और भी कई विद्वान और धर्मात्मा पुत्र थे किन्तु वो गोत्रकार ना थे अतः यहाँ उनकी चर्चा नहीं कर रहा..

ये सभी विश्वामित्र वंशी गोत्रकार कौशिक ब्राह्मण कहे जाते हैँ तथा ये सभी ब्रह्मक्षत्र अन्य सभी ऋषि कुलों मे विवाह करने योग्य हैँ 
प्रमाण महाभारत खिलभाग श्री हरिवंश पुराण हरिवंश पर्व अध्याय 27 श्लोक 53- 54 

केवल सांकृत ही नहीं हारित गालव कौशिक आदि अन्य सभी गोत्र भूमिहार ब्राह्मण सरयूपारी ब्राह्मण और अन्य सभी भारतीय ब्राह्मण समुदायों मे है प्रयाग एवं मगध क्षेत्र मे, चुकी क्षत्रिय का गोत्र पुरोहित के अनुसार बदल जाता है इस कारण गहमर के सकरवार राजपूतों का गोत्र बदल के शांडिल्य हो गया है किन्तु वो है कौशिक वंशी ही.

इसी प्रकार वशिष्ठ और अंगिरा के कुल मे भी सांकृत हुए हैँ जिनका वर्णन आगे के अंक मे लिखूंगा.. 

उधर और्व नाम से विख्यात ऋचिक मुनि को अपनी पत्नी सत्यवती से
 जम्दग्नि
शुन: शेप 
शुन: पुच्छ 

जम्दग्नि, जिन्हे उन्होंने महाराज रेणु के पुत्री रेणुका (इन्हे कामली भी कहा जाता है) से ब्याहा, जम्दग्नि ने रेणुका के गर्भ से 
रुक्मवान, सुषेण, वसु, विश्वावसु तथा महाज्ञानी विद्या विशारद महापराक्रमी 
परशुराम जी को प्रकट किया.

शेष अगले अंक मे...


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