छल

भारद्वाज गोत्रिय द्रुमटिकार/डोमकटार ब्राह्मणों के शव पर बसा है गोरखपुरिया सत्तासी राज
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भट्ट ग्राम टिकारी के भारद्वाज भूमिहार ब्राह्मणों का उल्लेख राष्ट्रकूट,यादव,सोम,भुज,पाल,चंदेल एवं परमार दानपत्रों में प्राप्त है जो इन भारद्वाज गोत्र द्रोणटिकार मूल के भूमिहार ब्राह्मणों की कम से कम ७वी_८वी सदी से उस क्षेत्र में उपस्थिति तो प्रत्यक्षतः पुष्ट करती ही है।

खोट्टिग दानपत्र से यह भी सिद्ध है कि यहीं (टिकारी) से भारद्वाज गोत्रि द्रुमटिकार कुल के ब्राह्मण कर्णाटक गये हैं।

कोलगल्लू दान पत्र तो टिकारी द्रोणटिकारों के कुल के सुप्रसिद्ध कवि मधुसूदन का भी नामोल्लेख करता है।

धातव्य है कि द्रोणाचार्य भी भारद्वाज ही थे।

कर्णाटक के यादव भिल्लम तृतीय के कलस बुद्रुख दान पत्र से भी टिकारी से भारद्वाजी ब्राह्मणों का कर्णाटक गमन सिद्ध है।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी टक्कार/टिकार और टेक्कार जैसे प्राचीन गढ़ भारद्वाज गोत्रिय ब्राह्मणों के अस्तित्व में रहे हैं जो भारद्वाज मूल टिकार का की याद संजोने हेतु इनके पूर्वजों का प्रयास रहा है ...

गोरख पूरी या सत्तासी राज की स्थापना भगवंत सिंह नामक श्रीनेत क्षत्रिय के पुत्रों के मध्य उसके जमींदारी के विभाजन के परिणाम स्वरूप हुई थी, भगवंत सिंह के नेतृत्व में श्रीनेत क्षत्रियों ने घर की विभाजनकारी आग बुझाने के लिए 12 वीं सदी में भारद्वाज गोत्र के डोमकटार भूमिहार ब्राह्मण जाति के लोगों को छलपूर्वक मारकर उनवल रतनपुर मगहर हवेली आदि गोरखपुर की भू भागों पर अधिकार स्थापित कर के किया था, ब्राह्मणों को ब्राह्मण भोजन पर निमंत्रण दे कर विषयुक्त भोजन कराया , तत्पश्चात शक्ति प्रायोग से बलपूर्वक इन स्थानों से बचे हुए लोगों को खदेड़ कर अधिकार कर लिया ।

भगवंत सिंह के पुत्र 
रणधीर सिंह 
जगधीर सिंह 
जय सिंह
दिलीप सिंह 
हुए , रणधीर सिंह (1153 से 11884 तक राज) को हवेली गोरखपुर का सत्तासी कोश का क्षेत्रफल प्राप्त हुआ। अतैव इनके वंशजों को गोरखपुरी राजा या सत्तासी राज कहा गया।

बाद में ब्रह्म हत्या का दंड मिला और सत्तासी राज के राजा विश्राम सिंह को कोई संतान न हुआ अतः होरील सिंह को गोद लेकर दत्तक पुत्र बनाय।।

इसी वंश में एक राजा गज सिंह  (1655 से 1694 तक राज )हुए जिनके पुत्र रूप। नारायण सिंह हुए , राजा रूप नारायण सिंह अतिमहत्वकांक्षी राजा हुए , उन्होंने डुमरी खजूरगंवा सिलहट भौवापार आदि को अपने राज्य में मिला लिया , रूप नारायण सिंह के 3 पुत्र हुए जिसमे बड़े पुत्र सर्वदमन सिंह को सत्तासी राज तथा बाबू राम सिंह को डूमरी की और बाबू श्रीनेवाज सिंह को खजूरगंवा की जमींदारी बबूआई में मिली।
स्वतंत्र सरदार के रूप में इनके मन माना आचरण से जनता विरुद्ध हुई जिसका लाभ उठा कर अवध के नवाब    सआदत खां बुरहान उल  मूल्क ने 1729 में इन्हे अपने अधीन कर लिया , तथा आगे ये नवाब और फिर अंग्रेजों के जमींदार के रूप में बने रहे।

शेष आगे .....

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