तुलसी वाणी (पुजिए विप्र शील गुण हीना)
पूजिए विप्र सील गुणहीना..
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मित्रों,
जिस महाकाव्य के थाह पाने को सैकडो मुनि कवि आज तक गोता लगा रहे, जिस महाग्रंथ पर साक्षात् विश्वनाथ शिव का हस्ताक्षर है :
सत्यं शिवम् सुन्दरम्
जिस रामचरितमानसजी को साक्षात् शिवजी ने प्रमाणित किया कि सत्य है सत्य है सत्य है, सुन्दर है सुन्दर है सुन्दर है, उसमे दोष दृष्टि रखने वाले को निश्चित समाज बाह्य कर दिया जाना चाहिए।
उन दोष दृष्टि रखने वालो से पूर्व नकली डिग्रीधारी प्रोफेसर बने हुए ब्राह्मण जवाब नही दे पाते तो दु:ख होता है, अरे भई
नही समझ आता तो श्रेष्ठ आचार्यों के शरण में जा के सीखो..
वहाँ भी न सकते तो मेरे जैसे विद्या-व्यसनी गृहस्थ के ही पास आ जाओ भई
मेकाले शिक्षित कुपढ़ प्रोफेसरो को न्यूज चैनल पर बिठाकर तुलसीदास और रामायण पर डिबेट चलाया जा रहा..
प्रसङ्ग है
पूजिअ विप्र सीलगुन हीना।
सूद्र न गुनगन ज्ञान प्रबीना।।
यह प्रकरण अरण्यकांड में, कबंध नाम राक्षस के प्रति भगवान् श्रीराम की उक्ति है:
(गीताप्रेस के संस्करण मे इसका अर्थ इस प्रकार है :)
शील और गुण से हीन ब्राह्मण भी पूजनीय है।गुणगणों से युक्त एवं ज्ञान प्रवीण शुद्र पूजनीय नहीं।
यही पेट दर्द का कारण है
कुछ लोगों का ..
खैर!
आइए इस चौपाई के प्रत्येक शब्द के अर्थ का व्याख्या करते हुए तुलसीदास बाबा का भाव समझते हैं :
विप्र
जन्मना जायते शूद्र: संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते।।
विद्या से विप्रत्व की प्राप्ति होती है
कबंध प्रसंग मे ही भगवान् राम कहते हैं :
श्रापत ताडत पुरुष कहंता।
विप्र पूज्य अस गावहीं संता।।
श्राप देता ,पीटता या डांटता विप्र भी पूज्य है क्यूं ?
क्यूंकि वो विद्या संपन्न है , हर परिस्थिति में वो कल्याण का ही भाव रखते हैं क्यूंकि
सा विद्या या विमुक्तये
विद्या ने उन्हे राग द्वेष काम क्रोध आदि माया जन्य विकारो से उन्हे मुक्त कर दिया है तभी वो विप्र हैं,फिर भी मायारुप संसार मे रहने के कारण धर्म मर्यादा अर्थात् प्रकृति को व्यवस्थित रखने के लिए ऐसा आवरण दिखाते हैं कि वो क्रोध में हैं ।
इसका एक उदाहरण तुलसीदासकृत इसी रामचरितमानसजी के बालकांड में देखें ,
(जब विश्वामित्र दशरथजी से भगवान् राम को मांगने आये हैं :)
सुनि राजा अति अप्रिय बानी।
हृदय कंप मुखदुति कुमुलानी।।
चौथेँ पन पाएउँ सुत चारी।
बिप्र बचन नहिँ कहेउ बिचारी।।
यह सर्वविदित है विश्वामित्र मुनी क्षत्रिय कुलोत्पन्न थे, आखिर विद्या के कारण ही उन्हे विप्रत्व प्राप्त हुआ।
यद्यपि राम से राजा दशरथ का वियोग हो रहा था फिर भी गुरु बशिष्ठ के कहने पर उन्होंंने कौशिक विश्वामित्र को राम सौंपा जिससे यह सर्वज्ञात है कि यज्ञपूर्ण होने से चराचर जगत् का, राक्षस वध से सृष्टि का, पाषाणी अहिल्या का, प्रणपूर्ति से श्रीविदेह जनक जी का तथा चार वधू प्राप्त कर समस्त रघुकुल तथा अवध का भला हीं हुआ।
* शील और गुण - शीलगुण द्वंद्व समास होने के कारण
शील
हीनैर्दीनैर्मलीनैश्च बीभत्सै: कुत्सितैरपि।
महतोऽछिद्रसंश्लेषं सौशीलयं विदुरीश्वरा:।।
सभी लोगों को बिना भेदभाव अपनाना शील है।
किन्तु बर्तमान मे भी कितना भी दलितप्रेमी हो पढा लिखा हो यदि राष्ट्रभक्त प्रधानमंत्री है तो क्या किसी पाकिस्तानी को अपना सलाहकार बनायेगा ?
नही नऽ
क्योंकि यह राष्ट्रधर्म के मर्यादा के अनुरुप नहि , ठीक उसी प्रकार यदि किसी विप्र ने अपनी साधना के मर्यादा के अनुरुप किसी को त्याग भी रखा है तो भी वह पूज्य है, जैसे शत्रु होने पर भी भारत का प्रधानमंत्री पाकिस्तान चीन जैसे शत्रु राष्ट्र मे भी तय अंतर्राष्ट्रिय सीमा मे सम्मानित ही होते हैं ।
गुण
गुण तीन हैं सत्व रज तम, जो मायामुक्त है वो तो सर्वथा त्रिगुणात्मक सृष्टि से स्वतः मुक्त (हीन) ही है, तभी साधु संन्यासी पूर्वाश्रम मे किसी भी जाती के क्यों नऽ रहे हो यदि बाह्मण के दरवाजे पर आ कर सेवा का सौभाग्य देते है तो उन्हे गृहस्वामी ब्राह्मण स्वयं से उच्च आसन ही देते हैं तथा पैर भी छूते हैं, वही मठों मे विद्वान् ब्राह्मण जाते हैं तो उन्हे भी संत साधु संन्यासी स्वयं से उच्च आसन देकर पैर पखार कर स्वागत करते हैं क्योंकि उनका भाव यही होता है जो तुलसी बाबा ने भी लिखा है :
🙏🏻बंदऊँ प्रथम महीसुर चरना।
मोह जनित संसय सब हरना।।
सुजन समाज सकल गुण खानी।
🙏🏻करऊँ प्रनाम सप्रेम सुबानी।।
~ रामचरित मानस
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