सूर्योपसना और सनातन राज तंत्र
सौर मंडल में नवग्रह के अधिपति भगवान सूर्य ही समस्त ज्ञान विज्ञान के श्रोत हैं , परंपरा से राजनीति शास्त्र अर्थ शास्त्र कृषि विज्ञान आदि विषय का ज्ञान भूमिहार ब्राह्मणों द्वारा विश्व में प्रसारित किया जाता रहा है, कुछ लोगों का तर्क है कि भारत वर्ष में सूर्योपासना शकद्विपी ब्राह्मणों के आने के पश्चात प्रारंभ हुई है जो उनके अधूरे ज्ञान को दिखाता है , महाभारत के अनुसार शकद्वीपी लोग भगवान शिव के उपासक थे , शकद्विपी ब्राह्मणों की सूर्योपासना सूर्य के मृत्युंजय स्वरूप की रही है क्योंकि शकद्विपि ब्राह्मणों का क्षेत्र मुख्यतया चिकित्सा रहा है।
भारत वर्ष में सूर्य के प्राचीन मंदिरों पर गौर करें तो योद्धा और शासक के रूप में अधिकांश मूर्तियां मिलती हैं, इसका एक प्रमाण यह भी है कि शकद्विपियों में हरित आदि गोत्र नही हैं, जबकि काशी में वृद्ध आदित्य के रूप में साधक साध्य भेद से हरित मुनि ही हैं जिनके वंशज मगध में भूमिहार ब्राह्मणों के यहां बारत,बिहटा (घोषी) आदि ग्राम से लेकर मेवाड़ तक फैले हैं, बप्पा रावल के कुल गुरु यही हरित गोत्र के भूमिहार ब्राह्मण या लोक भाषा में मेवाड़ के राजपुरोहित रहे , जिनके प्रेरणा से मेवाड़ में राणा राजवंश की स्थापना हुई।
वहीं जब सूर्य पुत्र रेवंत (जिन्हे युद्ध का देवता कहा जाता है ) के पूजा की चर्चा हो तो वर्तमान में भी मगध में केवल वत्स गोत्रिय भूमिहार ब्राह्मणों में यथा पांडुई आदि राजवंशों में ये आज तक जीवित है।
जब जब कूशासन से त्रस्त भारत में राजनीतिक उलट फेर होता है और धर्म परायण शासन की स्थापना हुई है सूर्य के गोचर और सूर्योपासक भूमिहारों का प्रभाव प्रमुखता से देखा गया है।
मयूर भट्ट के सूर्य शतकम और उनके वंशजों के बेतिया राज और मायर (औरंगाबाद, बिहार) मौआरी (औरंगाबाद बिहार), प्रीतिकूट (पिरो) से मयूर के संबंध जग जाहिर हैं। इनके वास्तविक नाम से अधिक उड़न भट्ट ( इनके ममेरे बहनोई बाण भट्ट के रचनाओ में इनका ये नाम विद्यमान है) या मयुर भट्ट ही अधिक प्रचलित रहा है।
ठीक वैसे ही जैसे कौटिल्य गोत्र के चनाकि ग्राम (तरेगना के पास) में जन्मे विष्णु गुप्त को कौटिल्य या चाणक्य नाम ही प्रसिद्ध रहा है, किंतु चानाकी में कौटिल्य गोत्र के भूमिहारों की आज तक उपलब्धता तथा बेलगार द्वारा पुष्ट किए चनाकी सूर्य मंदिर के प्राचीन अवशेष , साथ ही मगध से धौलपुर तक इनकी स्थिति , राजनीति और राजतंत्र में सूर्य उपासना और सूर्य उपासक भूमिहार ब्राह्मणों के योगदान को साक्षात परिलक्षित करती है।
कृषि राज व्यवस्था के संपन्न होने का आधार और सूर्य कृषि के आधार रहे हैं , इसी कारण मगध के लगभग प्राचीन भूमिहार ब्राह्मण के गांव में सूर्य मंदिर का होना कोई अतिशयोक्ति नहीं है।
धन्यवाद
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